ग्वालियर किसान की बेबसी: 4 साल के भूमि विवाद ने आत्मदाह तक पहुंचाया, वीडियो वायरल

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में किसान सरमन सिंह किरार ने 2 बिस्वा जमीन के विवाद में आत्मदाह का प्रयास किया। जानिए प्रशासनिक उपेक्षा, पटवारी पर आरोप और सोशल मीडिया वायरल वीडियो की पूरी कहानी।

ग्वालियर किसान की बेबसी: 4 साल के भूमि विवाद ने आत्मदाह तक पहुंचाया, वीडियो वायरल
जमीन विवाद के चलते किसान का आत्मदाह का प्रयास

ग्वालियर, मध्य प्रदेश: जमीन किसान की पहचान होती है, लेकिन जब वही जमीन उसके हाथ से छिनने लगे, तो जीवन अंधकारमय हो जाता है। यही अंधेरा ग्वालियर के भितरवार क्षेत्र के किसान सरमन सिंह किरार के साथ हुआ। बुधवार को उन्होंने भितरवार एसडीएम कार्यालय के सामने अपने शरीर पर पेट्रोल डालकर आत्मदाह का प्रयास किया। यह घटना तब हुई जब एसडीएम और तहसीलदार समेत कई अधिकारी मौजूद थे। सरमन के इस आत्मघाती कदम का वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

क्या हुआ था घटनास्थल पर?

सुबह के करीब 11 बजे, सरमन सिंह किरार अपनी पत्नी के साथ एसडीएम कार्यालय पहुंचे। उनके हाथ में एक पेट्रोल की बोतल थी। अचानक उन्होंने अपने ऊपर पेट्रोल डालना शुरू कर दिया और आग लगाने का प्रयास किया। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत उन्हें रोकने की कोशिश की। पेट्रोल की बोतल छीन ली गई, लेकिन इस दौरान सरमन के कपड़े पेट्रोल से सनी हुई थीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें स्थिर बताया।

4 साल से चल रहा है जमीन का संघर्ष

सरमन सिंह किरार की दर्दभरी कहानी 2 बिस्वा (लगभग 0.4 एकड़) जमीन को लेकर है। यह जमीन उनके परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही थी। लेकिन 4 साल पहले प्रशासन ने इसे "सरकारी भूमि" घोषित कर दिया। सरमन का दावा है कि उनके पास जमीन के कागजात हैं, लेकिन अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे। पिछले चार वर्षों में वह एसडीएम कार्यालय, तहसील और नगर परिषद के चक्कर लगाते रहे, लेकिन न्याय नहीं मिला।

पटवारी और पार्षद पर लगे गंभीर आरोप

सरमन ने न केवल प्रशासन बल्कि नगर परिषद के पार्षद पति रघुवीर सिंह यादव के बेटे पटवारी संजय यादव पर भी आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि संजय यादव ने जानबूझकर उनकी जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाया। सरमन की पत्नी ने बताया, "हमने कई बार शिकायत की, लेकिन पटवारी और अधिकारी एक-दूसरे के साथ मिले हुए हैं। हम गरीब किसानों की आवाज दबा दी जाती है।"

प्रशासन की प्रतिक्रिया: जांच का वादा

घटना के बाद एसडीएम राहुल राजेंद्र सिंह ने मामले की जांच का आश्वासन दिया है। उन्होंने बताया कि सरमन के दस्तावेजों की समीक्षा की जाएगी। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिक्रिया "औपचारिकता" से ज्यादा कुछ नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन छोटे किसानों के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेता।

सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला वीडियो

सरमन के आत्मदाह प्रयास का वीडियो ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप पर तेजी से वायरल हुआ। उपयोगकर्ताओं ने प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। एक यूजर ने लिखा, "किसान अपनी जमीन बचाने के लिए आत्महत्या करने को मजबूर है, और अधिकारी तमाशा देख रहे हैं।"

क्या कहता है कानून?

भूमि विवाद के मामले में मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के नियम स्पष्ट हैं। अगर किसी व्यक्ति के पास **खसरा नंबर, रजिस्ट्री दस्तावेज और पिछले 3 साल के राजस्व रिकॉर्ड** हैं, तो जमीन पर उसका अधिकार माना जाता है। सरमन के परिवार का दावा है कि उनके पास ये सभी दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन पटवारी ने गलत तरीके से रिपोर्ट तैयार की।

किसान आंदोलनों का लंबा इतिहास

मध्य प्रदेश किसान आंदोलनों के लिए जाना जाता है। मंदसौर फायरिंग और कृषि कानून विरोध ने किसानों के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया। विशेषज्ञों का मानना है कि सरमन की घटना इसी व्यवस्थागत उपेक्षा का नतीजा है। कृषि अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं, "छोटे किसानों को न्याय दिलाने वाली तंत्र धीमी और भ्रष्ट है। इसके कारण ही लोग आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं।"

स्थानीय नेताओं की चुप्पी पर सवाल

घटना के बाद से स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी चर्चा में है। विधायक ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसके विपरीत, कांग्रेस नेता ने प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग की है।

क्या है आगे का रास्ता?

  1. जांच समिति गठन: सरमन के दावों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
  2. पटवारी पर कार्रवाई: अगर संजय यादव दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए।
  3. मुआवजा और जमीन वापसी: सरमन को तत्काल उनकी जमीन लौटाई जाए और मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजा दिया जाए।

सिस्टम को बदलने की जरूरत

सरमन सिंह किरार की घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे कृषि तंत्र की विफलता है। जब तक जमीन विवादों को हल करने के लिए पारदर्शी और त्वरित प्रणाली नहीं बनेगी, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। किसानों को न्याय मिलना केवल उनका अधिकार नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।