उमरिया में कोल कम्पनी और जिला प्रशासन के खिलाफ ग्रामीणों का विरोध, उच्च न्यायालय जाने की तैयारी
उमरिया जिले के आदिवासी ग्रामीणों ने कोल कम्पनी जेएसडब्ल्यू और जिला प्रशासन के खिलाफ जमकर विरोध किया। खुले खदान के बजाय भूमिगत खदान खोलने के प्रयास पर ग्रामीणों ने आपत्ति जताई, और न्याय की मांग को लेकर उच्च न्यायालय जाने की चेतावनी दी।

मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के आदिवासी इलाके पाली में कोल कम्पनी जेएसडब्ल्यू और जिला प्रशासन के खिलाफ ग्रामीणों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध उस समय और बढ़ गया जब जेएसडब्ल्यू कम्पनी ने खुले खदान की योजना को बदलकर भूमिगत खदान बनाने की कोशिश की। इस बदलाव से स्थानीय किसानों और आदिवासियों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि यह इलाके का पर्यावरण और उनकी आजीविका पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।
कोल ब्लॉक का विवाद और जेएसडब्ल्यू की भूमिगत खदान योजना
उमरिया जिले के पाली जनपद पंचायत में कोयला उत्खनन के लिए दो निजी कम्पनियों को ठेका मिला है। इनमें से एक है बिलासपुर की श्रीरामा सीमेंट कम्पनी और दूसरी जेएसडब्ल्यू कम्पनी। पहले जब कोल ब्लॉक का सर्वे हुआ था, तो भारत सरकार और कोल इंडिया ने खुले खदान की योजना बनाई थी। इस योजना के तहत किसानों को मुआवजा भी दिया गया था और कई जिंदगी प्रभावित भूमि का अधिग्रहण भी कर लिया गया था।
लेकिन बाद में, जब इन ब्लॉक्स का निजीकरण किया गया और ठेके जेएसडब्ल्यू कम्पनी को दिए गए, तो उन्होंने अचानक खुली खदान के बजाय भूमिगत खदान बनाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया। यह कदम स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों के लिए काफी चिंता का कारण बन गया। उनका कहना है कि भूमिगत खदान के लिए आवश्यक अनुमति ना केवल भूमि अधिग्रहण के मामले में संदेह उत्पन्न करती है, बल्कि यह इलाके के पर्यावरण और उनके जीवनयापन को भी प्रभावित कर सकती है।
विरोध और प्रशासन पर आरोप
जेएसडब्ल्यू के अधिकारियों के खिलाफ यह विरोध और भी गंभीर तब हो गया जब वन विभाग और पर्यावरण विभाग ने इस योजना को मंजूरी देने से मना कर दिया, क्योंकि यह क्षेत्र बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पास स्थित है। इसके बावजूद, जेएसडब्ल्यू ने अपनी योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों से सहमति प्राप्त करने की कोशिश की।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिला प्रशासन और जेएसडब्ल्यू के अधिकारियों के बीच मिलीभगत है, जिसके चलते यह योजना बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के आगे बढ़ाई जा रही है। इस विरोध प्रदर्शन में उमरिया जिले के कई आदिवासी किसानों ने हिस्सा लिया और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। वे इस बात पर अड़े हुए थे कि उन्हें उनकी जमीन का उचित मुआवजा मिले और किसी भी स्थिति में इस खदान को शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाए।
लोक जनसुनवाई में बढ़ा तनाव
हालांकि, जिला प्रशासन और जेएसडब्ल्यू कम्पनी ने इस विरोध को खत्म करने के लिए लोक जनसुनवाई का आयोजन किया, लेकिन यह बैठक भी किसी हल पर नहीं पहुंच पाई। ग्रामीणों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार विरोध किया, और कई बार प्रशासनिक अधिकारियों के साथ उनके बीच तू-तू, मैं-मैं की स्थिति बनी। इस दौरान, प्रशासनिक अधिकारी भी ग्रामीणों के सवालों का संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे, जिससे सुनवाई पूरी तरह से नकारात्मक मोड़ पर पहुंच गई।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर प्रशासन ने उनकी बात नहीं मानी तो वे उच्च न्यायालय का रुख करने को तैयार हैं। उनका कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो वे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपनी आवाज उठाएंगे और प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर करेंगे।
सांसद, विधायक और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का भी विरोध
इस मुद्दे पर केवल स्थानीय ग्रामीण ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के विधायक और सांसद ने भी जेएसडब्ल्यू कम्पनी और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। सांसद और विधायक का कहना है कि यह आदिवासी इलाके का मामला है, और यहां की भलाई के लिए किसी भी निर्णय को बहुत सोच-समझ कर लिया जाना चाहिए। इसके साथ ही, वे भी यह चाहते हैं कि खुली खदान के बजाय भूमिगत खदान का प्रस्ताव बदल दिया जाए, ताकि इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण प्रभावित न हो।
आगे की राह
जेएसडब्ल्यू कम्पनी द्वारा भूमिगत खदान खोलने की कोशिश को लेकर ग्रामीणों की चिंता बढ़ रही है। वे चाहते हैं कि इस इलाके में कोल उत्खनन से पहले पूरी तरह से पर्यावरणीय आकलन किया जाए और उनके जीवन, भूमि और संस्कृति की रक्षा की जाए। वहीं, अगर प्रशासन और कम्पनी उनके विरोध को नजरअंदाज करते हैं, तो ग्रामीण अपनी आवाज को और बुलंद करने के लिए उच्च न्यायालय का सहारा लेने की पूरी तैयारी कर रहे हैं।
आखिरकार, यह सवाल सिर्फ एक कंपनी और प्रशासन के बीच का नहीं, बल्कि आदिवासी किसानों और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा का भी है। आने वाला समय बताएगा कि इस संघर्ष का क्या परिणाम होगा, लेकिन यह निश्चित है कि उमरिया के ग्रामीण अपनी आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।