धुळे, महाराष्ट्र। “भीख नहीं चाहिए, हमारा हक चाहिए… टुकड़ों में नहीं, पूरा विकास चाहिए!” इसी नारे के साथ महाराष्ट्र के धुळे जिले के साक्री तालुका स्थित काटवान इलाके के लोगों ने एक ऐसा कदम उठाया है जो पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बन गया है। सालों से टूटी-फूटी पड़ी सड़कों को ठीक करवाने की गुहार लगाते-लगाते थक चुके इन लोगों ने अब खुद ही road repair public participation का बेमिसाल उदाहरण पेश किया है।
बेहेड-नांदवण-भाडणे रोड की बदहाल स्थिति से परेशान होकर यहां के लोगों ने फावड़े और कुदाल उठा लिए हैं। ‘जल आक्रोश शेतकरी आंदोलन समिति, काटवान’ के नेतृत्व में शुरू हुए इस अनोखे अभियान में अब तक 6 JCB मशीनें और पानी के टैंकर भी जुट गए हैं।
सड़क की हालत देखकर आंखों में आते थे आंसू
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई सालों से यह सड़क इतनी खराब हो गई थी कि लोगों के लिए आना-जाना दूभर हो गया था। बरसात में तो हालत और भी बुरी हो जाती थी। गड्ढों से भरी इस सड़क पर रोजाना छोटे-बड़े हादसे होते रहते थे।
किसान अपनी फसल समय पर मंडी नहीं पहुंचा पाते थे। मरीजों को अस्पताल ले जाना मुश्किल हो गया था। स्कूली बच्चों को भी काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। लेकिन सरकार और प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
दर्जनों शिकायतें, मगर कोई सुनवाई नहीं
काटवान के लोगों ने बताया कि उन्होंने जिला प्रशासन, सार्वजनिक निर्माण विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास दर्जनों बार गुहार लगाई। लिखित शिकायतें दीं, धरना-प्रदर्शन किए, लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं मिला।
“हमने हर संभव प्रयास किए। विधायक से लेकर जिलाधिकारी तक सबसे मिले। वादे तो बहुत मिले, लेकिन काम का एक पत्थर भी नहीं बिछा,” समिति के एक कार्यकर्ता ने कहा।
आखिरकार लोगों की सहनशक्ति खत्म हो गई और उन्होंने यह ऐतिहासिक फैसला लिया कि अब और इंतजार नहीं करेंगे। खुद ही अपनी सड़क की मरम्मत करेंगे।
दो दिन में ही दिखने लगे नतीजे
गत दो दिनों से चल रहे इस road repair public participation अभियान में सैकड़ों लोग जुटे हैं। युवा, बुजुर्ग, महिलाएं – सभी अपने-अपने तरीके से योगदान दे रहे हैं। कोई JCB चला रहा है तो कोई मजदूरी कर रहा है।
खास बात यह है कि इस काम में एक भी सरकारी पैसा नहीं लग रहा। सारा खर्च गांव के लोग मिलकर उठा रहे हैं। जिसके पास पैसे हैं वो आर्थिक मदद कर रहा है, जिसके पास नहीं है वो श्रमदान कर रहा है।
“आज 6 JCB मशीनें एक साथ काम कर रही हैं। पानी के टैंकर भी लगे हुए हैं। रोड लेवलिंग का काम तेजी से चल रहा है,” एक स्वयंसेवक ने बताया।
गर्व भी है, दुख भी है
इस पूरे आंदोलन को लेकर लोगों के मन में मिलीजुली भावनाएं हैं। एक तरफ उन्हें गर्व है कि वे बिना सरकारी मदद के अपना काम कर पा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ यह भी दुख है कि उन्हें यह करना क्यों पड़ रहा है।
“जो काम सरकार का था, वो हम कर रहे हैं। यह खुशी की बात है कि हमारी एकता इतनी मजबूत है। लेकिन यह सवाल भी मन में आता है कि हम टैक्स किसलिए देते हैं? विकास के नाम पर मिलता क्या है?” एक ग्रामीण ने अपनी बात रखी।
समिति के पदाधिकारियों ने कहा, “लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है, यह हम साबित कर रहे हैं। लेकिन व्यवस्था की यह विफलता चिंताजनक है।”
सोशल मीडिया पर भी चर्चा
साक्री के इस अनोखे अभियान की चर्चा अब सोशल मीडिया पर भी जोरों पर है। लोग इस पहल की जमकर तारीफ कर रहे हैं। कई लोग कह रहे हैं कि यह पूरे देश के लिए एक मिसाल है।
हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सरकार को इस पर शर्म आनी चाहिए कि उनकी नाकामी के चलते आम जनता को खुद सड़क बनानी पड़ रही है।
और भी लोगों से अपील
समिति ने सभी नागरिकों से अपील की है कि वे जितना हो सके इस काम में हाथ बटाएं। चाहे आर्थिक सहयोग हो या श्रमदान, हर तरह की मदद का स्वागत है।
“यह सिर्फ सड़क बनाने का सवाल नहीं है। यह हमारे हक की लड़ाई है। हम साबित करना चाहते हैं कि जब जनता एकजुट हो जाती है तो कोई काम असंभव नहीं,” समिति के एक प्रवक्ता ने कहा।
यह पहल निश्चित रूप से प्रशासन के लिए भी एक संदेश है कि अगर वे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ेंगे तो जनता खुद अपना रास्ता बना लेगी।
















