मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक युवती की मौत के मामले ने पूरे शहर को हिला दिया है। 21 साल की वैष्णवी नागेश चौहान की गर्भाशय ऑपरेशन के दौरान मौत के बाद शुरू हुआ यह मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई और डॉक्टरों की हड़ताल तक पहुंच गया है। पांच दिन की भूख हड़ताल के बाद आखिरकार Burhanpur Hospital Sealed कर दिया गया, लेकिन अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इसके विरोध में 48 घंटे की हड़ताल घोषित कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
ग्राम जैनाबाद की रहने वाली वैष्णवी चौहान की 11 नवंबर को लालबाग रोड स्थित हकीमी अस्पताल में गर्भाशय ऑपरेशन के दौरान मौत हो गई थी। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से यह हादसा हुआ। उनका कहना है कि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं बुलाए गए, ऑपरेशन थिएटर में जरूरी संसाधन मौजूद नहीं थे और महत्वपूर्ण जानकारी परिजनों से छुपाई गई।
परिजनों ने बताया कि दूसरे दिन पुलिस ने महिला अधिकारी की मौजूदगी में डॉक्टरों की स्पेशल पैनल से पोस्टमार्टम कराया था। इसके अलावा अस्पताल के नाले की जमीन पर अतिक्रमण की शिकायत भी की गई, जिसकी जांच रिपोर्ट भी तैयार बताई जा रही है।
पांच दिन तक चली भूख हड़ताल
मौत के चार सप्ताह बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होने से नाराज परिजनों ने शनवारा गेट के पास धरना प्रदर्शन शुरू किया। पांच दिन तक चली क्रमिक भूख हड़ताल में शहरभर से लोग जुड़ते गए। हनुमान चालीसा पाठ और जनसमर्थन से आंदोलन को और बल मिला।
परिजनों ने कहा कि उनके परिवार का इतिहास सामाजिक संघर्ष से जुड़ा है, फिर भी न्याय पाने के लिए उन्हें सड़क पर बैठना पड़ा। “अगर हमारे साथ ऐसा हो रहा है तो आम लोगों की क्या हालत होगी?” – परिवार का यह सवाल प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सांसद के हस्तक्षेप के बाद मिला न्याय
शुक्रवार दोपहर खंडवा के सांसद ज्ञानेश्वर पाटील आंदोलन स्थल पर पहुंचे। परिजनों और रिश्तेदारों से मुलाकात के बाद उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रशासन से बात हो चुकी है और किसी भी दोषी को नहीं छोड़ा जाएगा। सांसद ने कहा कि ADM स्तर की जांच प्रक्रिया अंतिम चरण में है और परिणाम जल्द सामने आएंगे।
हालांकि परिजन लिखित आश्वासन मांग रहे थे, लेकिन सांसद के भरोसे के बाद उन्होंने हड़ताल खत्म करने का फैसला किया।
ADM की जांच में सामने आई गंभीर खामियां
कलेक्टर के आदेश पर ADM वीर सिंह चौहान की अध्यक्षता में बनाई गई जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी। सूत्रों के अनुसार, जांच में अस्पताल में कई नियमों के गंभीर उल्लंघन पाए गए:
- अस्पताल परिसर में संसाधन मानकों के अनुरूप नहीं थे
- महत्वपूर्ण सुविधाओं और संसाधनों का अभाव मिला
- अस्पताल मध्य प्रदेश उपचर्यागृह और रुजोपचार नियमों के अनुरूप नहीं था
- सबसे बड़ी बात – शासकीय सेवक डॉ. रेहाना बोहरा निजी अस्पताल में ऑपरेशन करती पाई गईं, जो सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन है
इन गंभीर खामियों के आधार पर Burhanpur Hospital License Cancelled करने का फैसला लिया गया।
शुक्रवार शाम हुई बड़ी कार्रवाई
शुक्रवार शाम को सीएमएचओ डॉ. आरके वर्मा ने आदेश जारी कर हकीमी अस्पताल का नर्सिंग होम पंजीयन और लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। जारी आदेश में सभी खामियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया। स्वास्थ्य विभाग ने यह कदम सीधे जांच रिपोर्ट के आधार पर उठाया।
लाइसेंस निरस्तीकरण के बाद परिजनों ने कहा, “अब हमें विश्वास है कि न्याय मिलेगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।” स्थानीय लोगों ने भी समय पर कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई।
अब IMA ने उठाया विरोध का झंडा
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। Burhanpur Hospital Sealed होने के बाद अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। IMA ने 48 घंटे की हड़ताल घोषित कर दी है।
IMA अध्यक्ष डॉ. आबिद सैयद ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा, “रजिस्ट्रेशन रद्द करने से पहले अस्पताल को कमियां सुधारने का मौका दिया जाता है। लेकिन इस मामले में बिना पूरी प्रक्रिया पूरी किए सीधे लाइसेंस निरस्त कर दिया गया। यह प्रक्रियागत न्याय के अनुरूप नहीं है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह ADM की जांच पर सवाल नहीं उठा रहे, लेकिन यह जरूर कहा कि जांच में जो कमियां मिलीं, उन्हें जारी नोटिस में उल्लेखित ही नहीं किया गया। “आदेश दबाव में जारी हुआ लगता है,” डॉ. सैयद ने कहा।
डॉक्टरों में नाराजगी का माहौल
IMA से जुड़े कई वरिष्ठ चिकित्सक भी इस फैसले को जल्दबाजी में लिया गया बताते हैं। IMA की वरिष्ठ सदस्य डॉ. कीर्तिका तारवाला ने चिंता जताते हुए कहा, “एक घटना के कारण मरीज और डॉक्टर के रिश्तों में कड़वाहट आई है। इसे सभी को समझना होगा और संवाद बनाए रखना होगा।”
डॉ. तारवाला ने कहा कि शहर की चिकित्सा सेवाओं पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़े, इसके लिए दोनों पक्षों को संयम से काम लेना चाहिए।
48 घंटे की हड़ताल का असर
IMA की हड़ताल घोषणा के बाद शहर में सभी ओपीडी सेवाएं 48 घंटे तक बंद रहेंगी। हालांकि, इमरजेंसी सेवाएं जारी रहेंगी ताकि गंभीर मरीजों को कोई परेशानी न हो।
इस हड़ताल का सीधा असर शहर के निजी चिकित्सा संस्थानों पर पड़ेगा:
- नियमित जांचें प्रभावित रहेंगी
- छोटे-बड़े ऑपरेशन टलेंगे
- ओपीडी आधारित उपचार बंद रहेगा
- केवल आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध रहेंगी
दोनों पक्षों की दलीलें
एक तरफ वैष्णवी चौहान के परिजनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि चार सप्ताह तक कोई कार्रवाई नहीं हुई और जनदबाव के बाद ही प्रशासन हरकत में आया। उनके अनुसार, अगर समय पर कार्रवाई होती तो शायद किसी और परिवार को ऐसा दर्द न झेलना पड़ता।
वहीं दूसरी तरफ, डॉक्टरों का कहना है कि प्रक्रिया का पालन किए बिना लाइसेंस रद्द करना सही नहीं है। उनका मानना है कि पहले कमियों को सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए था।
क्या कहती है जांच रिपोर्ट?
ADM की जांच रिपोर्ट में जो बातें सामने आई हैं, वे काफी गंभीर हैं। खासकर शासकीय सेवक का निजी अस्पताल में ऑपरेशन करना सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन है। साथ ही संसाधनों की कमी और मानकों का पालन न करना भी चिंता की बात है।
हालांकि, IMA का कहना है कि इन कमियों का उल्लेख नोटिस में नहीं किया गया, जो प्रक्रियागत खामी है।
आगे क्या होगा?
अभी स्थिति यह है कि Burhanpur Hospital Sealed हो चुका है और IMA की 48 घंटे की हड़ताल चल रही है। प्रशासन और चिकित्सक समुदाय के बीच यह तनाव शहर की स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में संवाद ही एकमात्र रास्ता है। प्रशासन को प्रक्रियागत न्याय सुनिश्चित करना चाहिए और चिकित्सकों को भी मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
समाज के लिए सबक
यह घटना कई सवाल खड़े करती है:
- क्या निजी अस्पतालों में पर्याप्त निगरानी है?
- शासकीय डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर कितना नियंत्रण है?
- मरीजों की सुरक्षा के लिए क्या मानक बने हैं?
- जनदबाव के बिना क्या प्रशासन सक्रिय नहीं होता?
वैष्णवी चौहान की मौत का मामला सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं है, यह पूरी व्यवस्था पर सवाल है। Burhanpur Hospital Sealed होना जरूरी कदम था, लेकिन अब यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
स्थानीय लोगों की मांग है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई और परिवार ऐसा दर्द न झेले। साथ ही, चिकित्सा समुदाय की भी यह जिम्मेदारी है कि वे मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
बुरहानपुर में अभी स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। अगले 48 घंटे बताएंगे कि प्रशासन और IMA के बीच कोई समाधान निकलता है या नहीं।
जानें क्या कहते हैं नियम और कानून
प्रश्न 1: क्या सरकारी डॉक्टर निजी अस्पताल में ऑपरेशन कर सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 की धारा 13 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि कोई भी शासकीय सेवक अपने पद पर रहते हुए किसी भी प्रकार की निजी प्रैक्टिस, व्यापार या रोजगार में संलग्न नहीं हो सकता। बिना सरकारी अनुमति के निजी प्रैक्टिस करना सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन है। इस पर निलंबन से लेकर सेवा से बर्खास्तगी तक की कार्रवाई हो सकती है। यह भारतीय प्रशासनिक सेवा (आचरण) नियम 1968 का भी उल्लंघन है।
प्रश्न 2: नियम विरुद्ध अस्पताल संचालन पर क्या कहते हैं कानून?
उत्तर: मध्य प्रदेश उपचर्यागृह एवं रुज्योपचार संस्था (रजिस्ट्रीकरण एवं अनुज्ञापन) अधिनियम 1973 के तहत बिना रजिस्ट्रेशन या मानक पूरे किए बिना अस्पताल चलाना पूरी तरह गैरकानूनी है। धारा 3 के अनुसार हर चिकित्सालय को रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। धारा 4 में निर्धारित स्टाफ, उपकरण और सुविधाएं होना जरूरी है। धारा 6 के तहत मानक पूरे न करने पर लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। धारा 9 में उल्लंघन पर 6 महीने की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। Burhanpur Hospital Sealed होना इसी कानून के तहत वैध कार्रवाई है।
प्रश्न 3: सरकारी डॉक्टर ड्यूटी में प्राइवेट प्रैक्टिस करें तो क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
उत्तर: मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम 1966 की धारा 8 और 9 के अनुसार ऐसे डॉक्टर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। लघु शास्ति में चेतावनी, निंदा या 1-3 वर्ष के लिए वेतन वृद्धि रोकना शामिल है। महा शास्ति में पद में कमी, सेवा से पृथक करना या बर्खास्त करना शामिल है। इसके अलावा भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम 2002 के तहत मेडिकल काउंसिल में शिकायत दर्ज कर पंजीकरण निलंबन या रद्द किया जा सकता है।
प्रश्न 4: क्या IMA की हड़ताल मानवता के खिलाफ नहीं?
उत्तर: हां, चिकित्सा नैतिकता के हिसाब से यह सवालों के घेरे में है। भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम 2002 की धारा 1.4 के अनुसार चिकित्सक का प्रथम कर्तव्य रोगी की सेवा करना है। आपातकालीन स्थिति में सेवा से इनकार नहीं किया जा सकता। हिप्पोक्रेटिक शपथ के अनुसार रोगियों के हित को सर्वोपरि रखना होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि चिकित्सा सेवा संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत आती है। हड़ताल से निर्दोष मरीजों को सजा मिलना अनुचित है।
प्रश्न 5: क्या दोषी डॉक्टर का समर्थन करना IMA के लिए उचित है?
उत्तर: नहीं, यह IMA के अपने संविधान के विपरीत है। Indian Medical Association Constitution के Article 2 में संगठन के उद्देश्यों में चिकित्सा में उच्च मानक बनाए रखना, नैतिकता को बढ़ावा देना और जनता के स्वास्थ्य हितों की रक्षा करना शामिल है। Article 8 में अनैतिक आचरण और पेशेवर कदाचार करने वाले सदस्यों की सदस्यता रद्द करने का प्रावधान है। किसी गलत कार्य का बचाव करना संगठन के उद्देश्यों और सार्वजनिक हित के खिलाफ है। संगठन को चाहिए कि वह न्याय प्रक्रिया में सहयोग करे, न कि बाधा डाले।
प्रश्न 6: लापरवाही से मौत होने पर क्या कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए?
उत्तर: हां, यह गंभीर अपराध है और इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 304A के तहत लापरवाही से मृत्यु कारित करने पर 2 साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 2(7) के अनुसार चिकित्सा में लापरवाही “सेवा में कमी” है और इस पर मुआवजे का प्रावधान है। सर्वोच्च न्यायालय ने Jacob Mathew vs State of Punjab (2005) और Indian Medical Association vs VP Shantha (1995) के मामलों में चिकित्सकीय लापरवाही को गंभीर अपराध माना है। यह क्षमा योग्य नहीं है।
प्रश्न 7: IMA को दोषी का साथ देने की बजाय क्या करना चाहिए?
उत्तर: IMA को कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। यदि प्रक्रियागत खामी है तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकते हैं। मध्य प्रदेश प्रशासनिक न्यायाधिकरण में भी अपील का अधिकार है। 45 दिन के भीतर आवेदन किया जा सकता है। लिखित आपत्तियां प्रस्तुत करना, कानूनी परामर्श लेना और उचित मंच पर अपील करना सही तरीका है। हड़ताल से आम जनता को परेशानी होती है, जो जनहित के खिलाफ है। मरीजों की सेवा जारी रखते हुए कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए।
प्रश्न 8: बुरहानपुर में ऐसी घटनाओं पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा?
उत्तर: मुख्य कारण नियमों का कमजोर क्रियान्वयन है। मध्य प्रदेश उपचर्यागृह अधिनियम 1973 की धारा 5 में साल में कम से कम दो बार नियमित निरीक्षण का प्रावधान है, लेकिन यह ठीक से नहीं हो रहा। धारा 6 में लाइसेंस रद्द करने से पहले 30 दिन का नोटिस और सुधार का अवसर देने का नियम है, जिसका पालन नहीं होता। निरीक्षण अधिकारियों की कमी, जवाबदेही तंत्र का अभाव और भ्रष्टाचार की संभावना मुख्य समस्याएं हैं। Burhanpur Hospital Sealed होने से पहले चार सप्ताह तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, यह दर्शाता है कि सिस्टम तभी जागता है जब बड़ा हादसा हो जाता है। सुधार के लिए डिजिटल निगरानी, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और त्वरित कार्रवाई जरूरी है।
कानून और मानवता दोनों जरूरी
Burhanpur Hospital Sealed होना कानून के तहत सही कदम था। नियम स्पष्ट हैं – सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते, अस्पतालों को मानक पूरे करने होंगे, और लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
लेकिन IMA की हड़ताल से प्रभावित होने वाले आम मरीज भी निर्दोष हैं। न्याय की लड़ाई कोर्ट में लड़ी जानी चाहिए, मरीजों को बंधक बनाकर नहीं।















