मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अयोध्या नगर इलाके में एक मां अपने ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे के लिए सालों से लड़ रही है, लेकिन सिस्टम और समाज की बेरुखी ने उसे इस हद तक तोड़ दिया कि उसने अपने ऊपर केरोसिन छिड़ककर खुद को आग लगाने की कोशिश कर दी। इस पूरी घटना की जड़ में है एक ब्लैकबोर्ड पर लिखा वह क्रूर वाक्य, जिसमें साफ-साफ लिखा था – “बच्चा ठीक नहीं हुआ तो जहर दे देंगे।” यही से शुरू होती है इस Autism Child Struggle की दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी।
इस मां का नाम अमिता गौतम है, जिसने अपने Autistic बच्चे के साथ हो रहे भेदभाव और अमानवीय बर्ताव को सोशल मीडिया पर शेयर किया। उसने बताया कि बच्चा गर्म तवे पर हाथ रख देता है, लेकिन चौंकता तक नहीं, जो साफ तौर पर ऑटिज़्म के गंभीर लक्षणों में से एक है।
Black Board पर लिखी धमकी और मां का टूटना
अमिता के मुताबिक, एक दिन उसने ब्लैकबोर्ड पर लिखा देखा कि अगर बच्चा ठीक नहीं हुआ तो उसे जहर दे देंगे। ये लाइन किसी मज़ाक या गुस्से में लिखी बात नहीं लगती, बल्कि एक ऐसी सोच को दिखाती है जो special children को बोझ समझती है। Autism Child Struggle का सबसे बड़ा दर्द यही है कि बीमारी से ज्यादा इंसान समाज के रवैये से टूटता है।
- मां कहती है कि इस तरह की बातें सुन-सुनकर उसका हौसला जवाब देने लगा।
- उसे लगने लगा कि शायद उसके बच्चे का इस दुनिया में होना ही लोगों को पसंद नहीं।
- यही मानसिक तनाव उसे उस मोड़ पर ले गया, जहां उसने अपने ऊपर केरोसिन छिड़ककर खुद को खत्म करने की कोशिश की।
यह कदम सिर्फ एक मां की हार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए आईना है कि हम Autism Child Struggle जैसी स्थितियों को समझने में कितने पीछे हैं।
सोशल मीडिया पर रोती-बिलखती मां की आपबीती
अमिता ने इंस्टाग्राम रील के ज़रिए अपना दर्द दुनिया के सामने रखा। वीडियो में उसकी आवाज़, उसके शब्द और आंखों के आंसू साफ बताते हैं कि वह अंदर से कितनी टूटी हुई है। उसने बताया कि न सिर्फ समाज, बल्कि कुछ डॉक्टरों और सिस्टम से जुड़े लोगों का रवैया भी बेहद कठोर और असंवेदनशील रहा।
- वह कहती है, लोग बच्चे को “नॉर्मल” बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन उसके लिए धैर्य और सपोर्ट देने को तैयार नहीं रहते।
- कुछ लोग यह तक कह देते हैं कि ऐसे बच्चे को क्यों पाल रही हो, छोड़ दो या उससे दूरी बना लो।
Autism Child Struggle का यह पहलू सबसे कड़वा है, जहां मां-बाप को बीमारी से ज्यादा इंसानों की बातें चुभती हैं।perplexity
बच्चा गर्म तवे पर हाथ रखता है, फिर भी नहीं चौंकता
अमिता ने बताया कि उसका बच्चा कई बार गर्म तवे पर हाथ रख देता है, लेकिन उसे न तो दर्द का अहसास होता है और न ही वह सामान्य बच्चों की तरह तुरंत हाथ खींच लेता है। यह ऑटिज़्म के उन लक्षणों में से है, जिसमें बच्चा दर्द या गर्मी जैसी Sensation पर सामान्य प्रतिक्रिया नहीं देता।
ऑटिज्म से जुड़े कुछ आम लक्षण इस तरह होते हैं:
- बच्चा आँखों में आँखें डालकर बात नहीं करता।
- उम्र के हिसाब से बोलने में देरी या बिल्कुल बोलना शुरू न करना।
- ज़्यादा शोर, भीड़ या बदलाव से चिड़चिड़ापन।
- कई बार दर्द या चोट पर भी सामान्य प्रतिक्रिया न देना।
AIIMS के डॉक्टरों ने भी चेतावनी दी है कि अगर बच्चा एक साल तक बड़बड़ाना (babbling) शुरू न करे या सामाजिक प्रतिक्रिया न दे, तो यह ऑटिज्म का शुरुआती संकेत हो सकता है और तुरंत जांच करानी चाहिए।
Autism क्या है और क्यों बढ़ रहा है संघर्ष
ऑटिज्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल कंडीशन है, जिसमें बच्चा व्यवहार, संवाद और सामाजिक संबंधों में सामान्य से अलग पैटर्न दिखाता है। इस कंडीशन में दिमाग चीजों को अलग तरीके से प्रोसेस करता है, इसलिए बच्चा आवाज़, रोशनी, स्पर्श या भावनाओं पर सामान्य बच्चों की तरह रिएक्ट नहीं कर पाता।
Autism Child Struggle इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि:
- समाज को अभी भी ऑटिज्म की पर्याप्त जानकारी नहीं है।
- लोग इसे “जिद”, “बिगाड़” या “पालन-पोषण की गलती” समझ लेते हैं।
- स्कूल और कई संस्थान ऐसे बच्चों के लिए trained staff और inclusive माहौल नहीं बना पाते।
शुरुआती पहचान क्यों है जरूरी
डॉक्टरों और विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म को अगर जल्दी पहचान लिया जाए, तो Therapy और सही Support से बहुत अच्छे सुधार देखे जा सकते हैं। भारत में AIIMS जैसे संस्थान लगातार इस पर जागरूकता फैला रहे हैं और माता-पिता को समय पर जांच के लिए motivate कर रहे हैं।
शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे:
- एक साल की उम्र तक बड़बड़ाना, मुस्कुराना या Response न देना।
- नाम पुकारने पर नहीं देखना या Reaction न देना।
- दो–तीन साल की उम्र तक साफ शब्द या वाक्य नहीं बोलना।
- बार-बार एक जैसा व्यवहार, चीजों को लाइन से लगाना, हाथ फड़फड़ाना आदि।
Autism Child Struggle में सबसे बड़ा हथियार समय पर पहचान और सही दिशा में उठाया गया कदम है।
मां-बाप पर मानसिक दबाव और समाज की जिम्मेदारी
अमिता का केस साफ बताता है कि ऑटिज्म वाले बच्चों के मां-बाप पर मानसिक दबाव कितना ज्यादा होता है। एक तरफ बच्चे की हेल्थ, Treatment और Future की चिंता, दूसरी तरफ लोगों की बातें, ताने और सिस्टम की उदासीनता, ये सब मिलकर उन्हें अंदर से तोड़ देते हैं।
- परिवार को अक्सर लगता है कि वे अकेले लड़ रहे हैं।
- कई बार Financial burden भी बढ़ जाता है, क्योंकि Therapy, Special स्कूल और डॉक्टर की विज़िट का खर्चा अलग होता है।
- समाज की support की जगह अगर तिरस्कार मिले, तो Depression और Suicidal thoughts तक आ सकते हैं, जैसा इस Autism Child Struggle में दिखा।
यही वजह है कि ऐसे मामलों में सिर्फ मेडिकल नहीं, बल्कि Emotional और Social support भी उतना ही जरूरी है।
ऑटिज्म बच्चों के लिए क्या मदद जरूरी
ऑटिज्म वाले बच्चों के लिए सिर्फ दवा काफी नहीं होती, बल्कि एक पूरा सपोर्ट सिस्टम चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन चीजों से काफी मदद मिल सकती है:
- Early Intervention Therapy: जितनी जल्दी Therapy शुरू होती है, उतना अच्छा Response मिलता है।
- Behavioural Therapy और Speech Therapy: बच्चे की Communication और Behaviour में धीरे-धीरे सुधार आता है।
- Special Educators: स्कूलों में trained टीचर्स हों, जो Autism Child Struggle को समझते हों।
- Parent Counselling: मां-बाप को भी समझाया जाए कि यह उनकी गलती नहीं, बल्कि एक मेडिकल कंडीशन है।
भारत में AIIMS और कुछ बड़े मेडिकल इंस्टिट्यूट ऑटिज्म पर लगातार काम कर रहे हैं और जागरूकता अभियान चला रहे हैं, लेकिन ग्राउंड लेवल पर अभी भी बहुत काम बाकी है।
समाज कैसे बदले – जिम्मेदारी सिर्फ परिवार की नहीं
इस तरह की खबरें सिर्फ Emotional नहीं, बल्कि Eye-opener भी हैं। अगर किसी स्कूल या इंसान ने ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया कि “बच्चा ठीक नहीं हुआ तो जहर दे देंगे”, तो यह सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि Crime जैसी सोच है।
हर इंसान की जिम्मेदारी है कि:
- Special children को बोझ नहीं, special समझा जाए।
- परिवार को Support दिया जाए, ताने नहीं।
- स्कूल, अस्पताल और संस्थान Inclusive Policy बनाएं, जहां Autism Child Struggle जैसे हालात पैदा ही न हों।
इस खबर से क्या सीखें
अमिता और उसके बच्चे की यह कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि हमारे समाज की सच्ची तस्वीर है। ऑटिज्म जैसे मुद्दों पर चुप रहने से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि ऐसे मामले और बढ़ेंगे। जरूरत है कि Autism Child Struggle को समझा जाए, उस पर बात की जाए और सिस्टम से लेकर समाज तक, सब मिलकर माहौल को संवेदनशील बनाया जाए।
इस तरह की हर कहानी हमें यह याद दिलाती है कि एक बच्चे की जिंदगी सिर्फ दवा से नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और सपोर्ट से भी बदल सकती है।















