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असीरगढ़ आशा देवी मंदिर: शेर करता है सफाई, जानें क्यों खास है विवाह-संतान की मन्नत

मध्य प्रदेश के असीरगढ़ स्थित आशा देवी मंदिर में रोज शेर करता है सफाई। आल्हा द्वारा बनवाया गया यह मंदिर विवाह व संतान की मन्नत के लिए प्रसिद्ध है, जानें पूरी कहानी।

Updated at: Tue, 30 Sep 2025, 6:53 PM (IST)
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हाइलाइट्स
  • असीरगढ़ किले के पास स्थित है मां आशा देवी का मंदिर
  • मान्यता है कि रोज़ मंदिर की सफाई करने आता है शेर
  • विवाह और संतान प्राप्ति की मन्नतें यहां पूरी होती हैं

क्या आपने कभी सुना है कि कोई ऐसा मंदिर भी है, जहाँ हर रात एक शेर अपनी पूंछ से सफाई करने आता हो? यह कोई फिल्मी कहानी या किस्सा नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के पास असीरगढ़ पहाड़ी पर स्थित मां आशा देवी के मंदिर से जुड़ी एक सदियों पुरानी मान्यता है। इस मंदिर की कहानी जितनी पुरानी है, उतनी ही चमत्कारों और वीरों के इतिहास से भरी हुई है।

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यह मंदिर सिर्फ अपनी प्राचीनता या चमत्कारी किंवदंतियों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहाँ आने वाले हर भक्त की आशा (मन्नत) पूरी करने के लिए भी प्रसिद्ध है। खासकर, जो लोग विवाह या संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर आते हैं, उनकी झोली माता खाली नहीं रहने देतीं।

आल्हा ने बनवाया था यह ‘गुप्त’ धाम

इस भव्य मंदिर का इतिहास आज से लगभग 900 साल से भी पुराना है। माना जाता है कि 12वीं शताब्दी (लगभग 1150 ईस्वी) में इसे किसी और ने नहीं, बल्कि महान योद्धा और कवि आल्हा ने बनवाया था। हाँ, वही आल्हा जो अपने भाई ऊदल के साथ चंदेल राजा परमर्दी देव के सेनापति थे और जिनकी वीरता के किस्से आज भी बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश के गाँव-गाँव में गाए जाते हैं।

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आप सोच रहे होंगे कि आल्हा और ऊदल तो उत्तर प्रदेश के महोबा के थे, तो उन्होंने यह मंदिर बुरहानपुर में कैसे बनवाया? दरअसल, यह मंदिर उनकी कुलदेवी मां आशा देवी को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, आल्हा अपनी कुलदेवी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे और उन्हें यहाँ स्थापित करना चाहते थे। जब उन्होंने असीरगढ़ की इस पहाड़ी को देखा, तो उन्हें यह जगह बेहद पवित्र लगी और उन्होंने अपनी कुलदेवी का यह मंदिर यहीं बनवा दिया। यह मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन राजपूत इतिहास और पृथ्वीराज चौहान के वंश से भी गहरा जुड़ा हुआ है, जैसा कि पास में स्थित असीरगढ़ का किला बताता है।

116 सीढ़ियां चढ़कर मिलता है मां का आशीर्वाद

मां आशा देवी के इस मंदिर तक पहुँचना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह मंदिर असीरगढ़ की हरी-भरी पहाड़ियों के बीचोबीच स्थित है, जिसके लिए भक्तों को 116 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह सीढ़ियां भक्तों की आस्था और उनकी परीक्षा लेने जैसी होती हैं। एक-एक कदम ऊपर चढ़ते ही मन में माँ के दर्शन की इच्छा और प्रबल होती जाती है, और ऊपर पहुँचते ही न सिर्फ मां का आशीर्वाद मिलता है, बल्कि आसपास के क्षेत्र का मनमोहक दृश्य भी दिखाई देता है। यह अहसास कराता है कि आप किसी साधारण स्थान पर नहीं, बल्कि एक दिव्य और ऐतिहासिक जगह पर आ गए हैं।

‘आशा’ पूरी होने पर चढ़ाई जाती हैं हरी चूड़ियां

इस मंदिर की एक बेहद खास और दिल को छू लेने वाली परंपरा है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु खास तौर पर दो चीजें मांगने आते हैं: अच्छा जीवनसाथी (विवाह की मन्नत) और संतान सुख (संतान प्राप्ति की मन्नत)।
मान्यता है कि माँ आशा देवी यहाँ आने वाले किसी भी भक्त को निराश नहीं करतीं। जब किसी भक्त की मुराद पूरी हो जाती है, चाहे वह संतान सुख हो या विवाह, तो वे माँ को धन्यवाद देने के लिए हरी चूड़ियां लेकर आते हैं। ये हरी चूड़ियां सिर्फ एक भेंट नहीं, बल्कि मां के प्रति अटूट विश्वास और पूरी हुई आशा का प्रतीक होती हैं। मंदिर परिसर में आपको ढेर सारी हरी चूड़ियां दिख जाएंगी, जो इस बात का प्रमाण हैं कि माँ आशा देवी का दरबार कभी खाली नहीं जाता।

रोज़ रात को मंदिर की सफाई करता है शेर!

जैसा कि हमने शुरू में बताया, इस मंदिर से जुड़ी सबसे चौंकाने वाली और अद्भुत बात है यहाँ के शेर की किंवदंती।

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स्थानीय लोगों और पुजारियों में यह पौराणिक मान्यता गहरी बैठी हुई है कि रोजाना रात को एक शेर मंदिर के अंदर आता है और अपनी पूंछ से पूरे मंदिर की सफाई करके चला जाता है! यह शेर कोई साधारण जानवर नहीं, बल्कि खुद मां आशा देवी की सवारी माना जाता है। यह किवदंती विशेष रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान और अधिक प्रचलित हो जाती है, जब दूर-दूर से भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।

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वैसे तो कुछ लोगों ने मंदिर के आस-पास शेर को देखने का दावा भी किया है, लेकिन रोज़ रात को सफाई की यह बात आज भी एक रहस्य बनी हुई है जो भक्तों की आस्था को और गहरा करती है। यह घटना सिर्फ इस बात का प्रतीक है कि माता अपने धाम की पवित्रता और सुरक्षा स्वयं करती हैं।

असीरगढ़: दक्षिण का ‘ताज महल’ और मुगलों की आखिरी जीत

मां आशा देवी का यह मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, वह असीरगढ़ का किला (Asirgarh Fort) कहलाता है। यह किला सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास का एक जीर्ण-शीर्ण, लेकिन गौरवशाली अध्याय है। इस किले का इतिहास भी उसी राजपूत वंश से जुड़ा है जिसका उल्लेख मंदिर के संदर्भ में किया गया है।

किवदंतियों के अनुसार, इस किले का नाम राजा आशा अहीर या असर राज चौहान के नाम पर पड़ा, जो पृथ्वीराज चौहान के ही वंशज थे। लेकिन इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि असीरगढ़ को ‘दक्कन का द्वार’ (Gateway to Deccan) कहा जाता था। जो भी शासक दक्षिण भारत में प्रवेश करना चाहता था, उसे इस किले को जीतना अनिवार्य था। यह किला इतना अभेद्य माना जाता था कि इसे भेदना लगभग नामुमकिन था।

लेकिन इतिहास में इसका सबसे बड़ा पल वह था जब मुगल बादशाह अकबर ने इसे जीता था। असीरगढ़ अकबर की आखिरी सैन्य विजय थी। यह जीत इतनी महत्वपूर्ण थी कि कई इतिहासकार इसे मुगल शक्ति के चरम का प्रतीक मानते हैं। सोचिए, जिस किले को आल्हा जैसे वीरों ने अपनी कुलदेवी के लिए चुना, उसकी ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्ता कितनी रही होगी। किला और मंदिर एक-दूसरे के पूरक हैं; किला बताता है इस क्षेत्र का प्राचीन राजसी गौरव, और मंदिर बताता है इसकी अटूट आध्यात्मिक शक्ति। आज भी जब आप किले की प्राचीर से नीचे देखते हैं, तो लगता है जैसे आप इतिहास के पन्नों पर खड़े हों।

चैत्र और शारदीय नवरात्रि: भक्ति और मेलों का महाकुंभ

जब बात मां आशा देवी मंदिर की होती है, तो नवरात्रि के नौ दिन यहाँ की रौनक देखने लायक होती है। चैत्र नवरात्रि (मार्च/अप्रैल) और शारदीय नवरात्रि (सितंबर/अक्टूबर) के दौरान, यह शांत पहाड़ी धाम, भक्ति के एक विशाल महाकुंभ में बदल जाता है।

दूर-दूर से श्रद्धालु इस उम्मीद में आते हैं कि इन नौ दिनों में मांगी गई मन्नतें माता जरूर पूरी करेंगी। नवरात्रि के दौरान यहाँ भव्य मेले का आयोजन होता है। पूरे मंदिर परिसर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है।

इन दिनों विशेष पूजा-विधि और कलश स्थापना की जाती है। सुबह और शाम को माता की भव्य आरती होती है, जिसमें सैकड़ों भक्त एक साथ शामिल होते हैं। कहा जाता है कि इन नौ दिनों में अगर कोई भक्त सच्चे मन से 116 सीढ़ियां चढ़कर माता के दर्शन करता है, तो उसे विशेष आशीर्वाद मिलता है।

स्थानीय लोक परंपराओं की छटा भी इन मेलों में देखने को मिलती है। भक्त गरबा और डांडिया (खासकर रात के समय) आयोजित करते हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक उल्लास से भर जाता है। मंदिर की किंवदंतियां, खासकर रोज रात को सफाई करने वाले शेर की कहानी, इन्हीं दिनों में सबसे ज्यादा सुनाई और महसूस की जाती हैं, जिससे भक्तों की आस्था और भी गहरी हो जाती है। यह समय न केवल मन्नतें मांगने का है, बल्कि अपनी संस्कृति और इतिहास को एक साथ जीने का भी है।

बुरहानपुर: इतिहास और पर्यटन का संगम

बुरहानपुर, मध्य प्रदेश के उत्तर-पश्चिम में स्थित, खुद में एक छोटा लेकिन समृद्ध इतिहास समेटे हुए है। यह शहर कभी खानदेश की राजधानी था और बाद में मुगलों के अधीन दक्कन का एक महत्वपूर्ण सूबा बन गया। मां आशा देवी मंदिर की यात्रा करने वालों के लिए, बुरहानपुर एक ‘वन-स्टॉप डेस्टिनेशन’ बन जाता है जो इतिहास, आध्यात्मिकता और वास्तुकला का मिश्रण प्रस्तुत करता है।

मंदिर तक कैसे पहुँचें?

  • सड़क मार्ग: बुरहानपुर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मंदिर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर असीरगढ़ किले के पास स्थित है। टैक्सी या स्थानीय परिवहन आसानी से उपलब्ध है।
  • रेलवे स्टेशन: बुरहानपुर रेलवे स्टेशन (BAU) एक प्रमुख जंक्शन है, जो इसे देश के कोने-कोने से जोड़ता है।
  • निकटतम हवाई अड्डा: निकटतम प्रमुख हवाई अड्डे इंदौर (Indore) और औरंगाबाद (Aurangabad) हैं। हवाई अड्डे से बुरहानपुर तक टैक्सी या बस सेवा उपलब्ध है।

बुरहानपुर में आप मां आशा देवी के दर्शन के अलावा भी कई ऐतिहासिक स्थल देख सकते हैं। इनमें जामा मस्जिद (जिसकी वास्तुकला अद्वितीय है), मुगल इंजीनियरिंग का चमत्कार खूनी भंडारा (एक प्राचीन जल वितरण प्रणाली), और आहूखाना (मुमताज महल का मूल विश्राम स्थल) शामिल हैं।

मां आशा देवी के मंदिर तक पहुँचने के लिए थोड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है, लेकिन बुरहानपुर की ऐतिहासिकता और इस क्षेत्र की सुंदरता आपकी यात्रा को न केवल धार्मिक, बल्कि एक रोमांचक पर्यटन अनुभव भी बना देती है।

आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में असीरगढ़ किले की गोद में स्थित मां आशा देवी का मंदिर (Ashadevi Mandir) केवल पत्थरों और मूर्तियों का ढांचा नहीं है। यह वीरों के शौर्य, राजपूतों की आस्था, और जनसामान्य के विश्वास का जीता-जागता प्रतीक है। 12वीं शताब्दी में आल्हा जैसे महान योद्धा द्वारा निर्मित, यह मंदिर सदियों से विवाह और संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले भक्तों की आखिरी उम्मीद रहा है।

चाहे वह मंदिर में रोज़ रात को होने वाली शेर द्वारा सफाई की चमत्कारी किंवदंती हो, या मुराद पूरी होने पर माता को हरी चूड़ियां चढ़ाने की अनूठी परंपरा, यह धाम हर किसी को अपनी ओर खींचता है। यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास और अध्यात्म एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि वे एक ही धागे में पिरोए हुए हैं।

अगर आप भी जीवन में किसी ‘आशा’ को पूरा होते देखना चाहते हैं, या भारतीय इतिहास के एक ऐसे ‘गुप्त’ रत्न को करीब से महसूस करना चाहते हैं, जहाँ हर सीढ़ी एक कहानी कहती है, तो एक बार मां आशा देवी मंदिर असीरगढ़ के दर्शन जरूर करें। इस मंदिर की पवित्रता और शांति आपको एक अविस्मरणीय अनुभव देगी।

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