महाराष्ट्र के धुले जिले के साकरी तालुका में पर्यावरण संरक्षण का एक शानदार उदाहरण देखने को मिल रहा है। यहां Joint Forest Management Committee (संयुक्त वन प्रबंधन समिति) के जरिए पिछले 25 से 30 सालों से स्थानीय नागरिक और वन विभाग मिलकर डवण्यापाडा जंगल की रखवाली कर रहे हैं। यह मॉडल साबित करता है कि सामुदायिक भागीदारी से प्रकृति का संरक्षण कैसे संभव है।
Joint Forest Management Committee: सात पाड़ों की सामूहिक जिम्मेदारी
डवण्यापाडा जंगल के संरक्षण के लिए बनाई गई Joint Forest Management Committee में कुल 45 सदस्य हैं। इस समिति में सात अलग-अलग पाड़ों के नागरिक शामिल हैं, जो मिलकर जंगल की देखभाल करते हैं। इस समिति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे वन विभाग के अधिकारियों के बराबर अधिकार दिए गए हैं। यानी फैसले लेने में स्थानीय लोगों की भी उतनी ही भागीदारी है जितनी सरकारी अधिकारियों की।
Joint Forest Management Committee के तहत जंगल की नियमित गश्त और रखवाली के लिए पांच गार्ड नियुक्त किए गए हैं। इन गार्डों की सैलरी का इंतजाम भी बेहद दिलचस्प तरीके से होता है। सात पाड़ों में कुल लगभग एक हजार घर हैं और हर घर सालाना 300 रुपये की राशि समिति को देता है। पहले यह योगदान पांच चंपे अनाज के रूप में दिया जाता था, लेकिन अब यह पैसों में बदल गया है।
1100 हेक्टेयर में फैला प्राकृतिक खजाना
डवण्यापाडा जंगल 1100 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इस जंगल में दो बांध और दो छोटे डैम भी मौजूद हैं, जो जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां लगभग 80 फीसदी सागवान की प्रजाति के पेड़ हैं, जबकि अन्य दुर्लभ वनस्पतियों की कई प्रजातियां भी बड़ी संख्या में पाई जाती हैं।
धुले जिले में बारीपाडा जंगल के बाद डवण्यापाडा दूसरा सबसे बड़ा जंगल है। बरसात के मौसम में यहां की नदियां, नाले और झरने पूरे उफान पर होते हैं, जो पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बनते हैं। प्रकृति की गोद में बसे ये खूबसूरत झरने और घना जंगल आज जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है।
अवैध कटाई से बढ़ता खतरा
हालांकि, 2025 से कुछ चिंताजनक गतिविधियां सामने आई हैं। कुछ लोग बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई कर रहे हैं और जंगल की जमीन पर खेती करने की कोशिश भी कर रहे हैं। Joint Forest Management Committee ने इन अवैध गतिविधियों की जानकारी वन विभाग के अधिकारियों को दी और निवेदन भी सौंपा, लेकिन अफसोस की बात यह है कि अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
समिति ने एक मजबूत संकल्प लिया है – “जल, जंगल, जमीन को बचाना ही होगा।” यह नारा स्थानीय समुदाय की पर्यावरण के प्रति जागरूकता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दुर्लभ वनस्पतियों का संरक्षण केंद्र
डवण्यापाडा जंगल में दुर्लभ वनस्पतियों का संरक्षण भी किया जाता है। Joint Forest Management Committee और वन विभाग के अधिकारियों की देखरेख में यह जंगल आज भी हरा-भरा और स्वस्थ है। इसी वजह से यह क्षेत्र पर्यावरण प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण स्थल बन गया है।
सामुदायिक भागीदारी का सफल मॉडल
Joint Forest Management Committee का यह प्रयोग यह साबित करता है कि जब स्थानीय समुदाय और सरकारी विभाग मिलकर काम करते हैं, तो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण न सिर्फ संभव है, बल्कि टिकाऊ भी होता है। हर घर से छोटा सा आर्थिक योगदान और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना ने इस जंगल को आज भी संरक्षित रखा है।
लेकिन अवैध कटाई और अतिक्रमण की बढ़ती घटनाओं पर तुरंत अंकुश लगाना जरूरी है। वन विभाग को Joint Forest Management Committee के साथ मिलकर सख्त कदम उठाने होंगे, वरना यह सफल मॉडल खतरे में पड़ सकता है।
Joint Forest Management Committee का यह प्रयास पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो देश के अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
















