मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में एक प्राचीन हनुमान मंदिर को लेकर जो विवाद शुरू हुआ, वो अब सियासी रंग लेता दिख रहा है। खड़कोद गांव के इस सदियों पुराने मंदिर के रास्ते को बंद करने के आरोप में भाजपा पिछड़ा वर्ग के जिला अध्यक्ष सुनील वाघे फंस गए हैं। जब ग्रामीणों ने शिकारपुरा थाने में शिकायत दर्ज कराई, तब जाकर नेता जी के सुर बदले। आइए जानते हैं इस पूरे बुरहानपुर हनुमान मंदिर विवाद की अंदर की कहानी।
क्या है पूरा मामला?
खड़कोद गांव का यह हनुमान मंदिर सिर्फ स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि आसपास के कई राज्यों से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन अचानक इस मंदिर तक पहुंचने वाला रास्ता बंद कर दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि भाजपा नेता सुनील वाघे ने अपने खेत के नाम पर मंदिर का रास्ता रोक दिया है।
गुस्साए ग्रामीणों और कन्हैया महाराज ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि जो व्यक्ति खुद को सनातनी बताता है, वही सनातन विरोधी काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि जब इस बारे में सुनील वाघे से बात की गई तो उन्होंने साफ कह दिया कि यह रास्ता उनके खेत में से होकर जाता है, इसलिए वो इसे बंद करने के हकदार हैं।
ग्रामीणों ने क्यों उठाई आवाज?
गांव के लोगों का कहना है कि यह रास्ता सदियों से मंदिर तक जाने के लिए इस्तेमाल होता आया है। सुनील वाघे के खेत का असली रास्ता पीछे की तरफ से आता है, लेकिन उन्होंने जानबूझकर मंदिर का रास्ता अपने कब्जे में लेने की कोशिश की।
जब बात नहीं बनी तो नाराज ग्रामीणों ने शिकारपुरा थाने पहुंचकर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि बुरहानपुर हनुमान मंदिर विवाद में सुनील वाघे ने अपने रुतबे और पैसे का घमंड दिखाया और धमकी भरे लहजे में कहा – “जो बन पड़े कर लो, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
भाजपा नेता का पलटवार और U-Turn
जब मामला गरमाया और पुलिस तक पहुंच गया, तब भाजपा के जिला अध्यक्ष सुनील वाघे ने अपना रुख बदल लिया। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि वो सनातन विरोधी नहीं हैं और पहले भी 10-12 मंदिरों का जीर्णोद्धार कर चुके हैं।
वाघे का कहना है कि मंदिर के पास काफी गंदगी थी और रास्ता भी ठीक नहीं था। इसलिए वो श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बेहतर पहुंच मार्ग और बैठने की व्यवस्था करा रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कांग्रेसी लोग इस मुद्दे को राजनीतिक फायदे के लिए उछाल रहे हैं।
सुनील वाघे ने यह भी कहा कि गांव के बड़े-बुजुर्ग जो भी फैसला करेंगे, वो उसे मानने को तैयार हैं।
ग्रामीणों ने खोली पोल
लेकिन गांव वाले इस बयान से संतुष्ट नहीं दिख रहे। उनका कहना है कि थाने पहुंचने से पहले उन्होंने कई बार सुनील वाघे को समझाने की कोशिश की, लेकिन वो किसी की सुनने को तैयार नहीं थे। जब स्थिति बिगड़ी और लोग एकजुट होकर खिलाफत पर उतर आए, तब जाकर उनके सुर बदले।
एक ग्रामीण ने कहा, “अगर पहले ही हमारी बात मान लेते तो मामला इतना बढ़ता ही नहीं। अब नेता जी को अपनी गलती का एहसास हो रहा है।”
क्या है आगे का रास्ता?
फिलहाल बुरहानपुर हनुमान मंदिर विवाद में गांव के बड़े-बुजुर्ग बीच-बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं। देखना यह होगा कि क्या सुनील वाघे अपने वादे पर कायम रहते हैं या फिर से पलटी मारते हैं।
ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो वो और बड़ा आंदोलन खड़ा करेंगे। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि मंदिर तक जाने वाला पुराना रास्ता खुला रहे, ताकि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के हनुमान जी के दर्शन कर सकें।
सियासी पेंच या जनता की लड़ाई?
इस पूरे मामले में एक बात साफ है कि जब आम लोग अपने हक के लिए एकजुट होते हैं तो बड़े से बड़े नेता को भी झुकना पड़ता है। बुरहानपुर हनुमान मंदिर विवाद में भी यही हुआ। पहले धमकी देने वाले नेता अब समझौते की बात कर रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या यह U-Turn सच्चा है या सिर्फ राजनीतिक दबाव में लिया गया एक कदम? समय ही बताएगा कि इस विवाद का अंत कैसे होता है। जैसा कि ग्रामीण कह रहे हैं – “अब सब हनुमान जी की मर्जी।”















