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Burhanpur Hakimi Hospital: सामाजिक कार्यकर्ता ने कैमरे के सामने फाड़ दिया 1 करोड़ का नोटिस! वीडियो हुआ वायरल

Burhanpur Hakimi Hospital controversy में नया मोड़। सामाजिक कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर 1 करोड़ के मानहानि नोटिस को फाड़ा। जानें पूरा मामला और हाईकोर्ट का फैसला।

Updated at: Sun, 14 Dec 2025, 10:49 AM (IST)
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बुरहानपुर: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक सामाजिक कार्यकर्ता नोटिस को फाड़ते हुए नजर आ रहे हैं। यह वीडियो बुरहानपुर के Burhanpur Hakimi Hospital और डॉक्टर रहना बोहरा से जुड़े विवादित मामले का हिस्सा है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंक सिंह ठाकुर ने फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर करते हुए दिल्ली के वकील द्वारा भेजे गए 1 करोड़ रुपए के मानहानि नोटिस का यह अनोखा जवाब दिया है। वीडियो में वह साफ शब्दों में कहते हैं – “यह रहा मेरा जवाब” और नोटिस को फाड़ डालते हैं।

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यह घटना उस समय सामने आई है जब Burhanpur Hakimi Hospital के खिलाफ मेडिकल लापरवाही का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।

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क्या है पूरा मामला?

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित हाकिमी अस्पताल और डॉक्टर रहना बोहरा का मामला विगत कुछ महीनों से चर्चा में है। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में गलत इलाज और लापरवाही की वजह से वैष्णवी चौहान की मौत हो गई। पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया कि गलत ऑपरेशन और इलाज में हुई चूक के कारण यह दुर्घटना हुई।

इस मामले में जब परिजनों ने आवाज उठाई और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों ने इस मुद्दे को उठाया, तो बुरहानपुर के इतिहास में पहली बार किसी अस्पताल का लाइसेंस निरस्त किया गया। लंबी जांच के बाद अधिकारियों ने Burhanpur Hakimi Hospital का लाइसेंस रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने भी खारिज की अस्पताल की याचिका

लाइसेंस निरस्त होने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। हाईकोर्ट ने अस्पताल के लाइसेंस निरस्तीकरण को बरकरार रखा और इस मामले पर टिप्पणी भी की।

इसकी जानकारी एक प्रेस वार्ता के माध्यम से पीड़ित परिवार के सदस्य महेश सिंह चौहान और अन्य परिजनों ने दी। इस दौरान हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता भी उनके साथ मौजूद थे।

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पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को मिला मानहानि का नोटिस

अब इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब दिल्ली के एक वकील की ओर से कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मानहानि का नोटिस भेजा गया। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि पत्रकारों ने अपनी खबरों में महिला डॉक्टर के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री पोस्ट की जिससे एक प्रतिष्ठित महिला चिकित्सक की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची।

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नोटिस में मांग की गई है कि आपत्तिजनक सामग्री को तत्काल हटाया जाए और माफीनामा प्रकाशित किया जाए, वरना 1 करोड़ रुपए का मानहानि का दावा दायर किया जाएगा।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ धमाकेदार जवाब

सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंक सिंह ठाकुर ने इस नोटिस का जवाब बेहद अनोखे तरीके से दिया। उन्होंने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा, “मुझे एक नोटिस मिला है जिसमें कहा गया है कि जो आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल किए हैं उन्हें हटाएं और माफी मांगें, नहीं तो 1 करोड़ रुपए का केस होगा।”

इसके बाद उन्होंने नोटिस को कैमरे के सामने ही फाड़ दिया और कहा – “यह रहा मेरा जवाब।” यह वीडियो तेजी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो गया और लोगों ने इसे खूब शेयर किया।

क्या आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है?

इस पूरे मामले को लेकर अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है – क्या सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की आवाज को दबाने के लिए नोटिस का इस्तेमाल हथियार के तौर पर किया जा रहा है?

कई लोगों का मानना है कि Burhanpur Hakimi Hospital प्रबंधन और संबंधित डॉक्टर की ओर से यह कदम न्याय की मांग करने वालों को चुप कराने की कोशिश है। ताकि कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता उनके खिलाफ आवाज न उठा सके और पत्रकार सच्चाई को जनता के सामने न रख सकें।

परिजनों का संघर्ष जारी

वैष्णवी चौहान की मौत के बाद से उनके परिजन लगातार न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने काफी संघर्ष किया और अपनी आवाज को बुलंद किया, जिसके परिणामस्वरूप अस्पताल का लाइसेंस निरस्त हुआ।

परिवार का कहना है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि सच्चाई सामने आएगी और जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी। वे किसी भी तरह की धमकी या दबाव से घबराने वाले नहीं हैं।

जनता की राय

सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया आ रही है। कुछ लोग सामाजिक कार्यकर्ताओं के साहस की तारीफ कर रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि मामले को कानूनी तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।

हालांकि, एक बात साफ है कि Burhanpur Hakimi Hospital का यह मामला अब सिर्फ एक मेडिकल नेगलिजेंस केस नहीं रहा, बल्कि यह प्रेस की आजादी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बन गया है।

मामला अभी भी चल रहा है और देखना होगा कि आगे क्या होता है। क्या परिजनों को न्याय मिल पाएगा या फिर यह मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझकर रह जाएगा?

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