मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां सरकारी योजनाओं का फायदा देने के नाम पर कुछ अधिकारी ही गरीब जनता को लुटवा रहे हैं। लाडली बहन के नाम पर घोटाला अब चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
करकेली और पाली जनपद पंचायतों के सीईओ ने दूसरे राज्यों से आई एक टीम को ‘अधिकृत पत्र’ जारी कर दिया। इस पत्र में साफ लिखा था कि पंचायतें इनकी “मदद करें।”
बस, फिर क्या था — इन बाहरी लोगों ने घर-घर जाकर ‘मकान नंबर प्लेट’ लगाने के नाम पर वसूली शुरू कर दी।
हर घर में नंबर प्लेट, हर जेब से 50 रुपये
करकेली जनपद की 110 ग्राम पंचायतों और पाली जनपद की 44 पंचायतों में करीब 460 से ज्यादा गांव हैं। इन सभी गांवों में हर घर से 50 रुपये वसूले जा रहे हैं।
टीम के लोग कहते हैं – “लाड़ली बहना योजना और बाकी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ये नंबर प्लेट जरूरी है।”
ग्रामीणों को एक छोटी सी रसीद दी जाती है, जिसमें न संस्था का नाम होता है, न कोई सरकारी पहचान।
गांव के लोग हैरान हैं — जब समग्र आईडी, आधार कार्ड और वोटर आईडी में पहले से मकान नंबर दर्ज है, तो फिर नया नंबर क्यों?
जागरूक ग्रामीणों ने उठाया विरोध
धवईझर गांव के कुछ जागरूक लोगों ने जब विरोध किया तो उन्हें “सीईओ का लेटर” दिखाकर चुप कराने की कोशिश की गई।
गांव के कारेलाल अगरिया ने बताया —
“दो लोग आये थे, बोले लाड़ली बहना का सर्वे चल रहा है। दो हितग्राही के नाम पर 100 रुपये ले गए और मकान पर नंबर प्लेट चिपका दी।”
वहीं संतोष सिंह बरकड़े ने कहा —
“25 लोगों से 50-50 रुपये लिये गए। कहा गया कि इससे सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा। पंचायत कर्मचारी भी साथ थे।”
सुरेश सिंह नाम के ग्रामीण ने बताया कि
“पंचायत इंस्पेक्टर और सचिव खुद कहते हैं कि ये लगवाना जरूरी है। अगर नहीं लगवाओगे तो योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा।”
ठगों की ‘रसीद’, पर कोई पहचान नहीं
रसीद पर न कोई पंजीकरण नंबर है, न संस्था का नाम। बस “लाड़ली बहना हितग्राही शुल्क” लिखा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इन लोगों ने घर-घर जाकर महिलाओं से 50 रुपये वसूल किए और परिवार की गोपनीय जानकारी भी जुटाई।
यानी योजना के नाम पर लोगों की मेहनत की कमाई और निजी जानकारी – दोनों लूट ली गईं।
कांग्रेस ने अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता और बार एसोसिएशन अध्यक्ष एडवोकेट पुष्पराज सिंह ने इसे “गरीबों के अधिकारों पर कुठाराघात” बताया।
उनका कहना है –
“मकान नंबर पहले से सभी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है। फिर नया नंबर लगाने और रुपए वसूलने की क्या जरूरत? अगर करना ही है तो सरकार खर्च करे, जनता से वसूली क्यों?”
उन्होंने मांग की है कि जिले के अधिकारी जांच कर जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई करें।
कितना बड़ा खेल चल रहा है?
करकेली जनपद के 353 गांवों में करीब 41,517 लाड़ली बहना हितग्राही हैं।
यदि हर हितग्राही से 50 रुपये वसूले गए, तो करीब 20 लाख 75 हजार रुपये से ज्यादा की रकम गरीब महिलाओं की जेब से निकल चुकी है।
कांग्रेस का आरोप है कि ये सब अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहा है।
पत्र जारी करने के बाद ठगों को “सरकारी अनुमति” का सहारा मिल गया है और यही पत्र ग्रामीणों को दिखाकर उन्हें भ्रमित किया जा रहा है।

सीईओ का बचाव और प्रशासन की सफाई
जब जिला पंचायत सीईओ अभय सिंह ओहरिया से इस मामले पर बात की गई तो उन्होंने कहा —
“लाड़ली बहना योजना से जुड़ा कोई सर्वे फिलहाल नहीं चल रहा है। अगर कोई व्यक्ति गांवों में जाकर पैसे वसूल रहा है तो यह गलत है। मामले की जांच कर दोषियों पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।”
लेकिन जब उनसे जनपद सीईओ द्वारा जारी पत्र की बात पूछी गई, तो उन्होंने कहा —
“हम उस पत्र की जांच कर रहे हैं। अगर यह नियम विरुद्ध पाया गया, तो निरस्त किया जाएगा।”
सवालों के घेरे में सीईओ और सिस्टम
करकेली जनपद की सीईओ हरनीत कौर कलसी और पाली जनपद की सीईओ कुंवर कन्हाई — दोनों ने ही स्पष्ट पत्र जारी किया है।
इन पत्रों की प्रति कलेक्टर, एसडीएम, सीईओ जिला पंचायत, थाना प्रभारी और बीएमओ तक को भेजी गई है।
इसके बावजूद जिला स्तर पर “कोई जानकारी नहीं” बताई जा रही है।
यही विरोधाभास अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है —
क्या यह सब कमीशन के खेल में दबा दिया जाएगा?

आदिवासी और गरीब इलाकों में सबसे ज्यादा असर
धवईझर और आसपास के आदिवासी बहुल गांवों में ज्यादातर लोग गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं।
योजना का नाम सुनते ही उन्हें भरोसा हो जाता है कि शायद इससे कुछ फायदा मिलेगा।
इसी भरोसे का फायदा उठाकर ठगों ने महिलाओं से रुपये वसूले और डर दिखाया कि “अगर नंबर नहीं लगवाओगे तो योजना से नाम कट जाएगा।”
जनता की मांग: कार्रवाई और पारदर्शिता
ग्रामीणों की साफ मांग है कि इस मामले में तुरंत जांच कराई जाए।
यदि योजना सच में जरूरी है, तो इसे पूरी तरह निःशुल्क किया जाए।
साथ ही, किसी भी बाहरी एजेंसी को पंचायत की अनुमति से पहले सत्यापन अनिवार्य किया जाए।
लोगों का कहना है —
“हम गरीब हैं, मेहनत से कमाते हैं। सरकारी योजना का नाम लेकर अगर अधिकारी ही हमसे पैसे वसूलेंगे तो भरोसा किस पर करें?”
बड़ा सवाल – ईमानदारी या कमीशन?
जिले में इस समय एक अजीब हालात बन गए हैं। हर विभाग में “कमीशन” का चलन खुलकर सामने आ रहा है।
सीईओ करकेली को मानपुर एसडीएम का भी प्रभार दिया गया है — जबकि दोनों जगहों की दूरी 60 किलोमीटर है।
ऐसे में यह साफ दिखता है कि काम की गुणवत्ता और निगरानी दोनों प्रभावित हो रही हैं।
लोगों का कहना है कि जिले में ईमानदारी सिर्फ दिखावे की बात रह गई है।
सरकारी कुर्सी अब गरीब की सेवा नहीं, बल्कि “कमाई का जरिया” बन चुकी है।
अब वक्त है सच सामने आने का
Ladli Behna Scam in Umaria सिर्फ एक ठगी का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की नाकामी का आईना है।
गरीब और आदिवासी वर्ग, जिन्हें सरकार मदद देना चाहती है, वही आज ठगी और धोखे के शिकार हैं।
अब देखना यह है कि प्रशासन वाकई कार्रवाई करता है या यह मामला भी कुछ दिनों में ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
ग्रामीणों की उम्मीद है कि कोई तो होगा जो उनकी आवाज सुनेगा और इस लूट को रोकेगा।















